Thursday, 24 November 2011

बाल गीत:

बस्ते का बोझ
[] डा. सुरेंद्र विक्रम 
इक ऐसी तरकीब सुझाओ, तुम कंप्यूटर भैया।

बस्ते का कुछ बोझ घटाओ, तुम कंप्यूटर भैया।।

हिन्दी, इंग्लिश, जी.के. का ही, बोझ हो गया काफ़ी।

बाहर पड़ी ‘मैथ’ की काँपी, कहाँ रखें ‘ज्योग्राफी’ ?

रोज़-रोज़ यह फूल-फूलकर, बनता जाता हाथी।

कैसे इससे मुक्ति मिलेगी परेशान सब साथी।।

‘होमवर्क’ इतना मिलता है, खेल नहीं हम पाते।

ऊपर से ‘ट्यूशन’ का चक्कर, झेल नहीं हम पाते।।

पढ़ते-पढ़ते ही आँखों पर, लगा ‘लेंस’ का चश्मा।

 भूल गया सारी शैतानी, कैसा अज़ब करिश्मा ?

घर-बाहर सब यही सिखाते, अच्छी-भली पढ़ाई।

पर बस्ते के बोझ से भैया, मेरी आफत आई।।

अब क्या करूँ, कहाँ  जाऊँ, कुछ नहीं समझ में आता ?

देख-देखकर इसका बोझा, मेरा सिर चकराता।।

घर से विद्यालय, विद्यालय, से घर जाना भारी।

लगता है मँगवानी होगी, मुझको नई सवारी।।

पापा से सुनते आए हैं, तेज दिमाग तुम्हारा।

बड़े-बड़े जब हार गए, तब तुमने दिया सहारा।।

मेरी तुमसे यही प्रार्थना, कुछ भी कर दो ऐसा।

फूला  बस्ता पिचक जाय, मेरे गुब्बारे जैसा।।